Memories

Monologues
4 min readFeb 5, 2022

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This is a poem in Hindi describing the pain one is going through due to eternal longing of an inamorata.

यादें

A Poem in Hindi by Santosh Akhilesh © २०२२

यादें तुम्हारी मुझे आती बहुत है।

बारीश की बूँदे बरसने को अब हैं।

रूठ के जाना तो आया है मेरी समझ में।

जाकर ना आना ना समझा मेरी कलम ने।

आँखें ये मेरी कब से यूँ है बरसती।

बारीश की बूँदों को फिर भी तरसती।

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ऐसी ख़ुशी है कीं आज आँखें भी नम है।

दुःख में याद आओ तो ना कोई ग़म है।

आज सब कुछ तो है पर ना जाने क्या कमी है।

मेरा गुनगुनाना और तेरा मुस्कुराना अब नहीं है।

तेरा यूँ चला जाना ईस दिल को ना भाया।

सोचा बहुत पर फिर समझ में भी ना आया।

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जब तक है साँसे ना जायेगी याद तुम्हारी।

फ़ूल बहुत है पर नहीं ख़ुस्बू है आती हमारी।

चलो सच में नहीं तो मेरी यादों में तो आ जाना।

सपने में तुमसे कर लूँगा रूठना और फिर मानना।

मिलना है तुमसे तो क्या चला जाना है ज़रूरी।

क़सम है तुम्हारी अब तो सही जाये ना ये दूरी।

Photo by Jens Lelie on Unsplash

कितना मनाऊँ और तुम्हें कैसे मनाऊँ।

जल बिन हूँ मछली तड़पता ही जाऊँ।

यादें तुम्हारी मुझे पल पल आती ही रहेंगी।

बारीश की बूँदे भी मुझसे से कहती रहेंगी।

कह कह कर भी अब वो थक सी गई है।

रात की चादर भी सिमटने सी लगी है।

Photo by Grégoire Bertaud on Unsplash

आख़िरी कोशिश तो मेरी अब कभी ख़त्म ना होगी

पता है मुझे की अब तुम मिल कर भी ना मिलोगी।

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यादें तुम्हारी मुझे आती बहुत है।

बारीश की बूँदे बरसने को अब हैं॥

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In-Short

Photo by Denise Johnson on Unsplash

यादें तुम्हारी मुझे आती बहुत है।

बारीश की बूँदे बरसने को अब हैं।

रूठ के जाना तो आया है मेरी समझ में।

जाकर ना आना ना समझा मेरी कलम ने।

आँखें ये मेरी कब से यूँ है बरसती।

बारीश की बूँदों को फिर भी तरसती।

ऐसी ख़ुशी है कीं आज आँखें भी नम है।

दुःख में याद आओ तो ना कोई ग़म है।

आज सब कुछ तो है पर ना जाने क्या कमी है।

मेरा गुनगुनाना और तेरा मुस्कुराना अब नहीं है।

तेरा यूँ चला जाना ईस दिल को ना भाया।

सोचा बहुत पर फिर समझ में भी ना आया।

जब तक है साँसे ना जायेगी याद तुम्हारी।

फ़ूल बहुत है पर नहीं ख़ुस्बू है आती हमारी।

चलो सच में नहीं तो मेरी यादों में तो आ जाना।

सपने में तुमसे कर लूँगा रूठना और फिर मानना।

मिलना है तुमसे तो क्या चला जाना है ज़रूरी।

क़सम है तुम्हारी अब तो सही जाये ना ये दूरी।

कितना मनाऊँ और तुम्हें कैसे मनाऊँ।

जल बिन हूँ मछली तड़पता ही जाऊँ।

यादें तुम्हारी मुझे पल पल आती ही रहेंगी।

बारीश की बूँदे भी मुझसे से कहती रहेंगी।

बारिश की बूँदें भी अब थक सी गई है।

रात की चादर भी सिमटने सी लगी है।

आख़िरी कोशिश तो मेरी अब कभी ख़त्म ना होगी

पता है मुझे की अब तुम मिल कर भी ना मिलोगी।

यादें तुम्हारी मुझे आती बहुत है।

बारीश की बूँदे बरसने को अब हैं॥

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About Me:

My name is Santosh Akhilesh, I’m a Computer Science Engineer; I love to and attempt to write about; Humans and Philosophy, Poets and Poems, Artists and Arts and Humans and Computers; all together, all intermingled, all united as an unison like a Beethoven Symphony.

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